INDIAN SANITATION WORKER
नमस्कार दोस्तों
कुछ दिनों पहले दिल्ली में सीवेज टैंक में काम करते हुए किशन लाल जी की दम घुटने से मौत हो गई.और उनकी बॉडी को ढूढ़ने में आठ घंटे लग गए। आज हम इसी सोशल गुलामी की चर्चा करेंगे।
हमारे देश मैं सब कुछ अच्छा है। परन्तु हमारे देश में ये गलत काम हजारों सालों से हो रहा है ,यह हमारे समाज पर एक धब्बे की तरह है ,जैसे एक दाग पूरे सफ़ेद कपडे को ख़राब कर सकता ह उसी तरह ये भी हमारे देश की प्रगति को भी प्रभावित कर सकता है!
हमारे देश में जो जातिबाद प्रथा है ,शायद ही और किसी देश में ऐसी कोई व्यवस्था हो। एक विशेष जाति वाले लोगों को ही इस काम के लिए जाना जाता है ,की उनके द्वारा ही ये काम किया जाना है. या यूँ कहे उनको इसी काम के लिए पहचाना जाता है । उनके द्वारा ही गंदे नाले और सीवेज टैंक साफ़ किये जायेंगे जो हजारों साल से ये काम कर रहे हैं।
सोचिये वो लोग कैसे इस काम से बाहर आएंगे ,क्यूंकि न तो उनके पास जागरूकता है ,और न ही शिक्षा। और कुछ लोग अपने फायदे के लिए उनको इस्तेमाल करते रहें है । कोई उन्हें छूना भी पसंद नहीं करता, उनके पास जाना पसंद नहीं करता ,यहां तक की उनको इलाज मिलने में भी देरी होती है क्योंकि वो गंदे होते हैं।
हमारे देश में लोकतंत्र है और हम बराबरी की बात करते हैं ह्यूमन राइट की बात करते हैं। पर इन लोगों के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। क्यंकि हमे डर हैं की ये लोग ये काम नहीं करेंगे तो कोन करेगा। आज जो हम स्वच्छ भारत अभियान की बात करते हैं सोचिये क्या वो इनके बिना संभव है। यदि ये लोग मना कर दे तो ये काम कोन करेगा कभी सोचा हे आपने।
१९९० के पहले ये काम प्राइवेट होता था, परन्तु उसके बाद इसे सरकार के द्वारा ठेके पैर कर दिया गया। और ये काम आज भी बिना सेफ्टी के हो रहा है। और इसके लिए सरकार कुछ भी नहीं कर रही है।
दोस्तों ये एक तरह की सामाजिक गुलामी नहीं तो और क्या है, सरकार को इन्हे सुरक्षा उपकरण तो देना ही चाहिए साथ ही साथ कुछ बेहतर उपाय करना चाहिए और इस काम के लिए टेक्नोलॉजी और मशीनों का उपयोग करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। एक बार जरूर सोचिएगा की हम क्या सोचते है इस बारे में.
कुछ दिनों पहले दिल्ली में सीवेज टैंक में काम करते हुए किशन लाल जी की दम घुटने से मौत हो गई.और उनकी बॉडी को ढूढ़ने में आठ घंटे लग गए। आज हम इसी सोशल गुलामी की चर्चा करेंगे।
हमारे देश मैं सब कुछ अच्छा है। परन्तु हमारे देश में ये गलत काम हजारों सालों से हो रहा है ,यह हमारे समाज पर एक धब्बे की तरह है ,जैसे एक दाग पूरे सफ़ेद कपडे को ख़राब कर सकता ह उसी तरह ये भी हमारे देश की प्रगति को भी प्रभावित कर सकता है!
हमारे देश में जो जातिबाद प्रथा है ,शायद ही और किसी देश में ऐसी कोई व्यवस्था हो। एक विशेष जाति वाले लोगों को ही इस काम के लिए जाना जाता है ,की उनके द्वारा ही ये काम किया जाना है. या यूँ कहे उनको इसी काम के लिए पहचाना जाता है । उनके द्वारा ही गंदे नाले और सीवेज टैंक साफ़ किये जायेंगे जो हजारों साल से ये काम कर रहे हैं।
सोचिये वो लोग कैसे इस काम से बाहर आएंगे ,क्यूंकि न तो उनके पास जागरूकता है ,और न ही शिक्षा। और कुछ लोग अपने फायदे के लिए उनको इस्तेमाल करते रहें है । कोई उन्हें छूना भी पसंद नहीं करता, उनके पास जाना पसंद नहीं करता ,यहां तक की उनको इलाज मिलने में भी देरी होती है क्योंकि वो गंदे होते हैं।
हमारे देश में लोकतंत्र है और हम बराबरी की बात करते हैं ह्यूमन राइट की बात करते हैं। पर इन लोगों के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। क्यंकि हमे डर हैं की ये लोग ये काम नहीं करेंगे तो कोन करेगा। आज जो हम स्वच्छ भारत अभियान की बात करते हैं सोचिये क्या वो इनके बिना संभव है। यदि ये लोग मना कर दे तो ये काम कोन करेगा कभी सोचा हे आपने।
१९९० के पहले ये काम प्राइवेट होता था, परन्तु उसके बाद इसे सरकार के द्वारा ठेके पैर कर दिया गया। और ये काम आज भी बिना सेफ्टी के हो रहा है। और इसके लिए सरकार कुछ भी नहीं कर रही है।
दोस्तों ये एक तरह की सामाजिक गुलामी नहीं तो और क्या है, सरकार को इन्हे सुरक्षा उपकरण तो देना ही चाहिए साथ ही साथ कुछ बेहतर उपाय करना चाहिए और इस काम के लिए टेक्नोलॉजी और मशीनों का उपयोग करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। एक बार जरूर सोचिएगा की हम क्या सोचते है इस बारे में.
जय हिन्द !

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